बुधवार, 17 दिसंबर 2008

26 नवम्बर, 2008


छब्बीस नवम्बर, २००८ को आतंकवादियों ने भारत के मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल और नरीमन हाउस पर कब्ज़ा कर लिया था। और गोलीबारी शुरू कर दी थी। मुंबई पुलिस, एनएसजी कमांडो और मरीन कमांडो को इन इलाकों को दहशतगर्दो के चंगुल से छुडाने में ५९ घंटे लगे। शनिवार की सुबह तक सुरक्षा बालों ने आतंकियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। ये देश पर हुआ अब तक का पहला फिदायीन हमला था। ये देश पर हुआ अब तक का हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला था। इस सबसे बड़े हमले के बाद पहली बार देश के राजनीती और जनता में बड़े पैमाने पर हलचल देखने को मिली। इस हमले के बाद पहली बार देश की जनता में नेताओं के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा देखने को मिला। इस आग में घी का कम किया बीजेपी की उस मुहीम ने, जिसके तहत उसने इस आतंकी हमले को कुछ दिनों बाद होने वाले विधानसभा चुनावो में भुनाने की कोशिश की। जनता ने इस पार्टी की कोशिश को सिरे से नकार दिया। इस हमले के लिए पुरी तरह से जनता ने नेताओं को जिम्मेदार बताया। जिसके चलते होम मिनिस्टर शिवराज पाटिल को अपनी कुर्सी छोडनी पड़ी। महाराष्ट्र के होम मिनिस्टर और उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल को भी इस्तीफा देना पड़ा। और आख़िर में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को भी अपने पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद सबसे दुखद घटना देखने को मिली बेंगलुरु में। शहीद संदीप उन्नीकृष्णन के घर पर। जहाँ केरला के चीफ मिनिस्टर श्री अचुतानंद को संदीप के पिता ने घर में नही घुसने दिया। दरअसल मुख्यमंत्री जी ने संदीप के शहीद होने पर कोई संदेश जरी नही किया था। जिसके चलते विपक्ष ने उनकी जमकर आलोचना की थी। इससे बचने के लिया अचुतानंद संदीप के घर गए थे। लेकिन इसमे भी वे एक गलती कर गए। ख़ुद वहा जाने से पहले उनके सुरक्षा में लगे कुत्ते वहां पहुच गए। और शहीद के घर के चप्पे-चप्पे को सूंघकर घर की तलाशी ली। शहीद और उसके परिवार इस कदा अपमान करने के बाद वे वहां पहुचे तो संदीप के पिता से नही रहा गया। उन्होंने उन्हें घर से जाने को कह दिया। और ना जाने पर आत्महत्या की धमकी दी। इसके बाद चीफ मिनिस्टर ने एक और वाहियात बयां दिया.."संदीप के पिता का अपने बेटे की मौत से मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। और अगर वो एक शहीद का घर नही होता तो वहा कोई कुत्ता भी झाँकने नही जाता।" खैर ये तो बात हो गई हमारे हुक्मरानों की।
अब एक और पहलु पर नजर डालते है। मुंबई को आतंक से आजाद कराने के दौरान मुंबई पुलिस के हाथ कसब नाम का एक आतंकवादी लग गया। जिसने अपनी गवाही से ये साबित कर दिया की इस हमले में पाक का हाथ है। कसब की गवाही से पहली बार भारत के हाथ पाकिस्तान के खिलाफ इतने पुख्ता सबूत मिले है। इस सबूतों के अधर पर भारत ने पाक पर अभूतपूर्व कुटनीतिक दबाव बनने में सफलता हासिल की है। यहाँ पर एक बात गौर करने वाली है की इस पुरे मसले पर अमेरिका भारत के पले में खड़ा दिखाई दे रहा है। जबकि इतिहास पे नज़र डाले तो पता चलता है की अमेरिका ने हमेशा पाक का साथ दिया है। कभी भी वो खुलकर पाकिस्तान के खिलाफ नही बोला। इस बार उसके भी तेवर पाक के खिलाफ कड़े है। शायद उसे भी ये समझ आ गया है की...पाक ही दुनिया में फैले आतंक का केन्द्र है।

बुधवार, 12 नवंबर 2008

भड़ास

ndtv पर एक प्रोग्राम आ रहा था। अभिज्ञान प्रकाश उस को होस्ट कर रहे थे । मर्ग्रेअत अल्वा के टिकेट बिकता है वाले बयान पर वो प्रोग्राम था । अभिज्ञान ने इस प्रोग्राम के दौरान कहा की अल्वा के इस बयान से इंगित होता है की राजनीती में भाई-भतीजा वाद है। मैं प्रकाश सर से पूछना चाहता हूँ की क्या मीडिया में भाई-भतीजा वाद नही चलता। मैं पिछले दो साल से सभी न्यूज़ पेपर्स और न्यूज़ चैनल्स में रिज्यूमे दे रहा हूँ। लेकिन आज तक कही से काल नही आई। एक किस्सा मुझे यहाँ याद आता है। मैंने एक बार इन्टर्नशिप के लिए रिज्यूमे दिया। तो मुझे स्वागत कक्ष से ही ये कह कर भगा दिया गया की हम इन्टर्नशिप नही कराते। लेकिन जब मैंने वहा पर अपना रिज्यूमे अपने एक जान पहचान वाले अंकल के जरिये दिया तो मुझे इन्टर्नशिप दे दी गई। इसे मैं क्या कहूँ, क्या ये भाई-भतीजा वाद नही है। मीडिया फिल्ड में ऐसा क्यों होता है?